समाज और सिस्टम के बीच फंसा मासूम, अधिकारियों ने BPL कार्ड किया रद्द

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हरियाणा न्यूज: रेवाड़ी के गांव जाटूसाना के सरकारी स्कूल में कक्षा सातवीं में पढ़ रहे छात्र रितिक की कहानी में कोई नायक नहीं है। जब वह 5 साल का हुआ मां उसे छोड़कर कहीं चली गईं। वह जिंदा है या दुनिया में नहीं है कोई पता नहीं है। जब वह 9 साल का हुआ पिता टीबी की बीमारी के कारण चल बसा। जन्म से ही अलग रहे दादा- दादी जिंदा है लेकिन वे खुद ही इतने बीमार रहते हैं कि उन्हें ही सहारा चाहिए। रितिक की दिनचर्या ये है कि वह घर में अकेला रहता है। दिन में किसी तरह स्कूल के मिड डे मिल से उसका पेट भर जाता है लेकिन शाम होते ही पड़ोसियों के घरों की तरफ नजरें दौड़ जाती है कि कौन उसे दो रोटी देकर जाएगा। कहानी यहां खत्म नहीं शुरू होती है। 9 साल के रितिक को नहीं पता था कि उसके जीवन में एक के बाद एक क्या हो रहा है। उसने कई राते भूख पेट गुजारी।

स्कूल समय में उसका दिन सही गुजर जाता था लेकिन कोई ना कोई छुट्टी आने से वह भरपेट भोजन के लिए तरस जाता था। मासूम इतना है कि चाहते हुए भी किसी को खुलकर नहीं कह पाता था। मासूम अब ये समझ नहीं पा रहा कि आखिर उसका कसूर क्या है। माता-पिता उसे छोड़कर चले गए तो कार्ड को बचाने के लिए वह नए माता-पिता कहां से ले आए। वहीं जिला पार्षद अमित यादव पिछले दो दिनों से इस बच्चे के राशनकार्ड को लेकर सरकारी कार्यालयों में चक्कर लगा रहे हैं। अमित ने कहा कि सरकार को अगर यह बच्चा अभी भी गरीब नजर नहीं आता है तो कृपया करके बीपीएल सिस्टम को ही बंद कर देना चाहिए।

हालांकि अधिकारी चाहे तो क्या नहीं कर सकते। जानकारों की मानें तो इस तरह के खास मामलों में डीसी खुद संज्ञान लेकर इस बच्चे की मदद कर सकते है लेकिन ऐसे करे कौन। कुल मिलाकर इस मासूम की कहानी समाज और सिस्टम की वह असलियत को बयां कर रही है जिसमें मानवीय संवेदनाएं खत्म होती नजर आ रही है। बची है तो वह बाबूगिरी व दलाली जिसके माध्यम से ऐसे लोगों के भी बीपीएल कार्ड बन जाते हैं जो आलीशान घरों में रहते हैं और जमकर सरकारी योजनाओं का फायद उठाते हैं।

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